📰 मोरी में नरेगा श्रमिकों के हक पर सवाल
विधायक दुर्गेश्वर लाल व परिजनों के जॉब कार्ड को लेकर उठी निष्पक्ष जांच की मांग
ग्रामीण बोले—यदि दावे सही हैं तो गरीब मजदूरों के अधिकारों पर सीधा प्रहार
मोरी (उत्तरकाशी)।
विकासखंड मोरी क्षेत्र में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (नरेगा) को लेकर विवाद लगातार गहराता नजर आ रहा है। स्थानीय ग्रामीणों, सामाजिक संगठनों और जागरूक नागरिकों के बीच चर्चा है कि पुरोला विधायक दुर्गेश्वर लाल तथा उनके परिजनों के नाम से नरेगा जॉब कार्ड बनाए जाने और कार्य दर्शाए जाने के दावे सोशल मीडिया पर सामने आए हैं, जिसके बाद पूरे प्रकरण की निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच की मांग तेज हो गई है।
ग्रामीणों का कहना है कि नरेगा योजना का मूल उद्देश्य ग्रामीण गरीब, बेरोजगार और जरूरतमंद श्रमिकों को रोजगार उपलब्ध कराना है। यदि वायरल दावों में कोई सच्चाई है और पात्रता शर्तों के विपरीत जॉब कार्ड बनाए गए, तो इसका सीधा असर वास्तविक मजदूरों के काम और मजदूरी पर पड़ता है।
🔍 नियमों के पालन को लेकर उठे सवाल
स्थानीय लोगों का कहना है कि नरेगा के दिशा-निर्देशों में सरकारी पद पर आसीन व्यक्ति या नियमित रूप से अन्य माध्यमों से कार्यरत व्यक्तियों की पात्रता को लेकर स्पष्ट प्रावधान हैं। ऐसे में विधायक और उनके परिवार से जुड़े नामों के जॉब कार्ड और भुगतान की चर्चा सामने आने के बाद यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि—
क्या जॉब कार्ड नियमों के अनुरूप बनाए गए?
क्या जिन नामों से भुगतान दर्शाया गया, उन्होंने वास्तव में नरेगा कार्यस्थल पर श्रम किया?
क्या इससे वास्तविक गरीब श्रमिकों के हिस्से का काम या भुगतान प्रभावित हुआ?
❓ जनता के सीधे सवाल
ग्रामीणों ने प्रशासन के समक्ष कई अहम सवाल रखे हैं—
मोरी क्षेत्र में नरेगा के तहत किन-किन लोगों के जॉब कार्ड स्वीकृत किए गए?
क्या सभी जॉब कार्ड पात्रता मानकों के अनुरूप हैं?
संबंधित कार्यों की जियो-टैग फोटो, मस्टर रोल और उपस्थिति विवरण सार्वजनिक क्यों नहीं किए जा रहे?
नरेगा मद में हुआ भुगतान पूरी तरह पारदर्शी और नियमसम्मत है या नहीं?
🗣️ “यह गरीब मजदूरों के हक का मामला है”
सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि नरेगा किसी राजनीतिक लाभ की योजना नहीं, बल्कि गरीब परिवारों के लिए जीवनरेखा है। यदि इसमें किसी भी स्तर पर अनियमितता होती है, तो इसका सीधा नुकसान उन्हीं मजदूरों को होता है, जिनके लिए यह योजना बनाई गई है।
उनका यह भी कहना है कि जनप्रतिनिधियों से अपेक्षा होती है कि वे पारदर्शिता और जवाबदेही का उदाहरण प्रस्तुत करें, ताकि जनता का भरोसा शासन-प्रशासन और योजनाओं पर बना रहे।
📢 प्रशासन व जनप्रतिनिधियों की भूमिका पर नजर
ग्रामीणों के बीच यह चर्चा भी है कि पूर्व में भी पुरोला विधायक पर जातिवाद, कमीशनखोरी जैसे आरोपों की चर्चाएं होती रही हैं। अब नरेगा से जुड़े दावे सामने आने के बाद लोगों की नजरें प्रशासन और स्थानीय जनप्रतिनिधियों पर टिक गई हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि मोरी ब्लॉक प्रमुख रणदेव राणा ने सार्वजनिक मंचों से भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त रुख अपनाने की बात कही थी। ऐसे में जनता यह जानना चाहती है कि क्या इन दावों की निष्पक्ष जांच कराई जाएगी।
साथ ही यह सवाल भी उठ रहे हैं—
क्या विकासखंड अधिकारी मोरी से जवाब तलब किया जाएगा?
क्या जिलाधिकारी स्तर से उच्च स्तरीय जांच समिति गठित होगी?
कुछ लोगों का यह भी कहना है कि स्थानीय जांच एजेंसियों पर भरोसा कम होने के कारण स्वतंत्र एजेंसी या एसआईटी से जांच की मांग अब जोर पकड़ रही है, ताकि “दूध का दूध और पानी का पानी” हो सके।
📌 राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया का इंतजार
इस पूरे मामले में मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस, अन्य राजनीतिक दलों एवं संगठनों की ओर से फिलहाल कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। वहीं प्रशासनिक स्तर पर भी अब तक किसी जांच की औपचारिक घोषणा नहीं की गई है।
ग्रामीणों का साफ कहना है—
“यह किसी व्यक्ति विशेष का नहीं, बल्कि गरीब मजदूरों के अधिकार और योजना की साख का सवाल है। यदि आरोप निराधार हैं तो वह भी स्पष्ट होना चाहिए, और यदि सही हैं तो सच्चाई जनता के सामने आनी चाहिए।”

