
सेम मुखेम का इतिहास पौराणिक कथाओं और स्थानीय लोकगाथाओं में गहराई से निहित है, जो इसे उत्तराखंड में एक महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल बनाता है। यह स्थान मुख्य रूप से भगवान कृष्ण को उनके नागराजा (सर्प राजा) रूप में समर्पित है, और इसे अक्सर उत्तराखंड के “पंचम धाम” (पांचवें पवित्र स्थल) के रूप में जाना जाता है।

भगवान कृष्ण का आगमन: स्थानीय किंवदंतियों के अनुसार, महाभारत युद्ध के बाद मानसिक शांति की तलाश में या कालिया नाग का मर्दन करने के बाद भगवान कृष्ण इस सुंदर स्थान पर आए थे।
गंगू रमोला की कथा: प्रचलित कथा है कि भगवान कृष्ण एक वृद्ध ऋषि के वेश में स्थानीय राजा, गंगू रमोला के पास गए और उनसे रहने के लिए थोड़ी जमीन मांगी। राजा ने शुरू में एक घुमंतू व्यक्ति को जमीन देने से इनकार कर दिया। इसके बाद, राजा के राज्य में सूखा और बीमारी फैल गई और उसके मवेशी पत्थर के हो गए। राजा को अपनी गलती का एहसास हुआ, उसने क्षमा मांगी और भूमि अर्पित की, जहाँ बाद में मंदिर का निर्माण हुआ।
नागराजा के रूप में स्थापना: राजा के पश्चाताप के बाद, भगवान कृष्ण ने नागराजा के रूप में अपनी दिव्य उपस्थिति का खुलासा किया और वहीं निवास करने का फैसला किया। मंदिर में एक अद्वितीय आकार का पत्थर है, जिसकी पूजा नागराजा के रूप में की जाती है।
अन्य कथाएं: एक अन्य कहानी बताती है कि जब भगवान कृष्ण ने यमुना नदी में कालिया नाग को हराया, तो उन्होंने उसे इस स्थान पर जाने और शांति से रहने का निर्देश दिया।

यह मंदिर नाग देवता को समर्पित सबसे बड़े मंदिरों में से एक माना जाता है।
भक्तों का मानना है कि यहां सच्चे मन से मांगी गई मुरादें पूरी होती हैं और कालसर्प दोष से भी मुक्ति मिलती है।
हर साल नवंबर में यहां एक वार्षिक मेला लगता है, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु उमड़ते हैं।
