देहरादून: उत्तराखंड समेत देशभर के राज्यों में आईएएस, आईपीएस और आईएफएस अधिकारियों के तबादलों की प्रक्रिया अब केंद्र सरकार की कड़ी निगरानी में आने वाली है. भारत सरकार के कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DOPT) ने सभी राज्यों के मुख्य सचिवों को पत्र भेजकर सिविल सर्विसेज बोर्ड (CSB) के आधार पर किए गए तबादलों का पूरा लेखा-जोखा तय प्रारूप में मांगा है. यह जानकारी वार्षिक आख्या के रूप में 1 जनवरी तक केंद्र को उपलब्ध करानी होगी.
उत्तराखंड में आईएएस अधिकारियों के तबादलों को लेकर सिविल सर्विस बोर्ड गठित ही नहीं है. उधर, भारतीय पुलिस सेवा में पुलिस मुख्यालय के स्तर पर ही प्रस्ताव तैयार होते हैं. जबकि एक मात्र IFS अधिकारी ही हैं, जिनके लिए मुख्य सचिव स्तर पर बोर्ड गठित है और यहीं से तबादलों के लिए सिफारिशें भी की जाती हैं. ये बात इस समय इसलिए चर्चा में है क्योंकि कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग, भारत सरकार ने मुख्य सचिव को पत्र लिखकर सिविल सर्विस बोर्ड की सिफारिश को लेकर वार्षिक आख्या भेजने के निर्देश दिए हैं.
केंद्र का यह पत्र सामान्य औपचारिकता नहीं, बल्कि उत्तराखंड जैसे राज्यों के लिए बड़ी चुनौती बनता दिख रहा है. वजह साफ है कि राज्य में भारतीय वन सेवा (IFS) को छोड़ दें तो भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) और भारतीय पुलिस सेवा (IPS) के तबादलों में सिविल सर्विस बोर्ड की भूमिका लगभग न के बराबर है. आईएएस के लिए जहां ऐसा कोई सिस्टम ही नहीं तो IPS पुलिस मुख्यालय की समिति तक ही सीमित है.
पत्र में साफ तौर पर उल्लेख किया गया है कि सुप्रीम कोर्ट के 31 अक्तूबर 2013 के आदेश के अनुपालन में कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग ने पहले ही राज्यों को निर्देश जारी किए थे. इसके तहत वर्ष 2014 में IAS कैडर नियम, 1954 में संशोधन किया गया, जो आईपीएस और आईएफएस पर भी समान रूप से लागू होते हैं.


